परम पूज्य स्वामी हंसानंद गिरि जी का जन्म 3 फ़रवरी 1996 को बिहार (वर्तमान झारखंड) के पूर्वी सिंहभूम जिले के चाकुलिया ग्राम में एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। बचपन से ही वे ईश्वर भक्ति, गीता पाठ और मंदिर दर्शन में विशेष रुचि रखते थे।
स्वामी जी के घर प्रायः संत-महात्माओं का आगमन होता रहता था। इन्हीं में से एक संत श्री अविनाशी राम जी ने उनका नाम श्याम प्रकाश रखा। प्रारम्भिक शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिर से प्राप्त करते हुए उनके जीवन पर स्वामी विवेकानंद जी की जीवनी का गहरा प्रभाव पड़ा। तभी से उनके मन में संन्यास और अध्यात्म की ओर आकृष्ट होने की भावना जागृत हुई।
दसवीं की परीक्षा के पश्चात वे आगे की पढ़ाई के नाम पर टाटानगर गए, परंतु वहीं से जम्मूतवी की ट्रेन पकड़कर घर-परिवार को सदा के लिए त्यागकर आत्म-खोज की यात्रा पर निकल पड़े। यह यात्रा उन्हें जम्मू, पंजाब, हिमाचल, दिल्ली, उत्तर प्रदेश होते हुए अंततः हरिद्वार लेकर आई।
हरिद्वार में संन्यास मार्ग की शुरुआत
जुलाई 2010 में हरिद्वार गंगा तट पर उन्हें वही महात्मा मिले जो अक्सर उनके स्वप्न में दर्शन देते थे। यहीं से संन्यास जीवन की शुरुआत हुई। संन्यास दक्षिणा की व्यवस्था के लिए उन्होंने होटल में बर्तन धोकर धन अर्जित किया। तत्पश्चात उन्हें ब्रह्मचर्य दीक्षा मिली और नया नाम प्राप्त हुआ-हंसानंद।
इसी दौरान भारत में भ्रष्टाचार और कालाधन के खिलाफ चल रहे भारत स्वाभिमान आंदोलन से वे जुड़े और पतंजलि योगपीठ के स्वामी रामदेव जी के निकट आए। पतंजलि में उन्होंने अध्ययन एवं अध्यापन दोनों कार्य किए और विद्यार्थियों की व्यवस्था भी संभाली।
समाज सेवा एवं कथा प्रवचन
वर्ष 2016 में पतंजलि से बाहर आकर उन्होंने अपने जीवन को समाज और अध्यात्म सेवा के नए आयाम में समर्पित किया। उन्होंने गो-कथा, राम-कथा, भागवत-कथा का प्रचार-प्रसार प्रारम्भ किया तथा राष्ट्र सेवा ट्रस्ट की स्थापना की।
वर्ष 2019 में प्रयागराज कुंभ में परम पूज्य युगपुरुष स्वामी परमानंद जी महाराज से संन्यास लेकर वे स्वामी हंसानंद गिरि बने। तत्पश्चात उन्होंने बिहार, झारखंड, बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, गुजरात सहित नेपाल तक अनेक स्थलों पर कथा प्रवचन किए और भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर प्रेरित किया।
सेवा मार्ग और भक्तों का आश्रय
कोरोना काल के दौरान उन्होंने वृंदावन धाम में श्री युगपुरुष धाम आश्रम के लिए भूमि ली, जहाँ वृद्ध माताओं की सेवा का शुभ संकल्प लिया गया। आज यह आश्रम भक्तों के लिए भी एक दिव्य स्थल बन रहा है, जहाँ हर कोई संत-सेवा, भक्ति और निःस्वार्थ सेवा का अनुभव कर सकता है।
स्वामी जी का सम्पूर्ण जीवन ईश्वर भक्ति, राष्ट्र सेवा और मानवता की निःस्वार्थ सेवा को समर्पित है। कथा, भक्ति और समाज सेवा के माध्यम से वे जनमानस को धर्म, प्रेम और सदाचार के मार्ग पर अग्रसर कर रहे हैं।
स्वामी जी का आशीर्वचन
“प्रिय भक्तजनो, आप सबका जीवन भक्ति, सेवा और सत्य के मार्ग पर प्रगति करे। जो भी इस आश्रम से जुड़ता है, वह केवल सेवा ही नहीं करता, बल्कि स्वयं ईश्वर की कृपा का अनुभव करता है। अपने जीवन को प्रेम, करुणा और भक्ति से भरिए — यही सच्चा साधना मार्ग है।”